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17 août 2011 / C. Mandal

Uskā bacpan, de Krishna Baldev Vaid

Uskā bacpan (« Son enfance »), publié en 1957, est le premier roman de Krishna Baldev Vaid. Récit partiellement autobiographique, il décrit l’univers du jeune Birou. Cet univers est celui d’une petite bourgade du Punjab vers la fin des années trente. Cet univers est en réalité plus étroit, la narration, bien qu’à la troisième personne, n’allant rarement au-delà des perceptions propres à l’esprit de l’enfant. L’univers de Birou se limite donc essentiellement à sa ruelle (galī) et à son foyer, sombre et enfumé, théâtre quotidien de querelles domestiques qui opposent tantôt la mère à la belle-mère, la mère à la fille ou la mère au père. Ce n’est pas anodin, si l’auteur a choisi pour titre de sa traduction anglaise Steps in Darkness.

Si le récit déborde souvent de colère, de frustration et d’amertume, il n’en est pas moins rafraîchissant. Le style est direct, tout en étant brodé de métaphores qui n’appartiennent qu’à l’auteur. Les dialogues sont des perles de réalismes et les voix de Birou, de sa soeur aînée et de ses camarades raisonnent aux oreilles du lecteur comme autant de voix familières. Uskā bacpan est souvent considéré comme un récit réaliste, un des récits les plus réalistes de l’auteur (avec la suite qu’il lui donnera en 1981 : Guzarā huā zamānā), mais il ne s’agit en rien du réalisme d’un Balzac ou d’un Henri Bosco. Vaid écrit après la Partition, qu’il a lui-même directement éprouvée, étant originaire d’une bourgade située aujourd’hui dans l’actuel Pakistan. Cette expérience a enraciné en lui un sentiment d’exil et de fragmentation qui habite toute son œuvre et qui conditionne sa perception de la réalité :

La réalité, je la vois et je l’éprouve de façon fragmentaire. Les personnages de mes romans n’échappent pas non plus à cette tare visuelle. Le jour où je pourrai percevoir la réalité totale sera sans doute le jour où je serai délivré de l’enfer de l’écriture. Et de l’enfer de la vie. (…) Mais, bien qu’on ne perçoive la réalité que de façon fragmentaire, on peut élaborer ds techniques romanesques capables de la faire apparaître comme un tout indivis. C’est justement pour cette raison que la plupart des romans ne me satisfont pas ; c’est aussi pour cette raison que les romans accèdent en général à la popularité. Ils construisent le fragment de réalité avec une rigidité qui lui confère une apparence d’indivision, d’infrangibilité. Cela fait déjà plus de cinquante ans que Virginia Woolf a annoncé, en décembre 1912, que quelque chose avait changé dans l’humanité et sa représentation. Mais nous n’avons toujours pas entendu. Tout romancier vigilant se doit de faire passer ce message saisissant – pas seulement pour en faire profiter les autres, mais pour sa propre gouverne aussi. Je l’ai pour ma part entendu pour al première fois, ce message, en écrivant Uskâ bachpan (« Son enfance ») – pas de la bouche de Virginia Woolf, de la mienne. Je parle d’août 1947, aps de décembre 1912, parce que c’est à ce moment-là que j’ai pris conscience de la transformation de l’humanité. C’est dans Uskâ bachpan que j’ai pour la première fois restitué la fragmentation de la réalité dans une structure fragmentaire. Style et contenu ne peuvent apparaître dans leur unité que dans l’écriture, pas avant, cette unité ne précède pas l’écriture. Je veux dire que la forme ne court pas après le fond, que le fond ne préexiste pas à la forme, que sans elle le contenu n’a aucune authenticité, qu’il n’existe tout simplement pas.

Pas de réponse, pp. 48-49, extrait cité par Annie Montaut dans sa « Préface » à Lila (Caractères, 2004)

La trame narrative du roman est minimaliste et le nombre de personnages réduit. Quelques évènements majeurs ponctuent le récit : la mort de la grand-mère, suivie de celle du jeune frère, l’amitié nouvelle de Birou et d’Aslam, l’entrée en scène de deux nouveaux personnages, Bahanji et son fils adoptif Naresh, dont s’entiche Devi, la soeur aînée de Birou, jusqu’à la crise finale où le père de Birou tente de mettre fin à ses jours.

Extrait 1 : Incipit (p.7)

दादी चारपाई में पड़ी हुई है – मैली कुचैली, सिकुड़ी सिमटी, ठीठुरी और उलझी हुई सी, जैसे किसी ग्रामीण की कोई ढीली ढाली गठरी हो, जो किसी भी समय खुलकर बिखर सकती है ।

चारपाई की गहराई में दादी औंधे मुँह पड़ी हुई है, जैसे कोई बच्चा रोते रोते सो या मर गया हो ।

चारपाई ड्योढ़ी के एक कोने में है। बाक़ी कोने ख़ाली पड़े हैं, जिससे चारपाई वाला कोने भी वीरान सा नज़र आता है ।

ड्योढ़ी इस मकान का मुँह है, जो कभी खुलता है तो कभी बंद हो जाता है । जब खुलता है तो रसोई से फटता हुआ धुआँ मुक्त हुए बंदी के समान धीरे धीरे बाहर गली की ओर चल पड़ता है, लेकिन उसकी मन्द गति से सन्देह पैदा होता है कि वह इस कारागार से मुक्त होने पर क्षुब्द है, मानो वह बंदी न हो, इसी घर का वासी ही हो । और जब यह मुँह बंद हो जाता है तो धुआँ किसी शैतान बच्चे की भाँति ड्योढ़ी में मचलने लगता है । और दादी खाँस खाँसकर निढाल हो जाती है ।

Notre traduction :

Grand-mère est affalée sur le lit. – dépenaillée, ratatinée, engourdie et ébouriffée, comme si c’était un baluchon quelconque, à moitié défait, laissé là par un villageois, et qui pourrait à tout moment s’ouvrir et se répandre.

Grand-mère est affalée à plat ventre dans les profondeurs du lit, comme un enfant qui se serait endormi ou serait mort en pleurant.

Le lit est dans un coin de l’entrée. Les autres coins gisent vides, d’où l’impression que le coin avec le lit est désert lui aussi.

L’entrée, c’est la gueule de cette maison, qui parfois s’ouvre et parfois se ferme. Quand elle s’ouvre, sort de la cuisine une fumée semblable à un prisonnier, qui lentement se dirige dehors vers la ruelle, mais de son allure ralentie naît ce message – être libérée de prison la rend nerveuse, comme si elle était, non pas un prisonnier, mais bien un des habitants de cette maison. Et quand cette gueule se ferme, alors la fumée, à la façon d’un enfant turbulent, se met à trépigner à l’entrée. Et grand-mère tousse jusqu’à défaillir.

Extrait 2 : reproduction partielle du chapitre 6 (pp. 47-56)

माँ उसके पास बैठकर उसके गाल सहलाना शुरू की देती है । माँ के खुरदरे हाथों से प्याज़ और मिट्टी के तेल की बू आती है । वह नाक के बजाय मुँह से साँस लेने लगता है । माँ उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाकर उसका मुँह बन्द कर देती है । और फिर धीरे धीरे बोलने लगती है – हे ईश्लर ! हे मालिक ! जगत पिता जगदीश्वर !

दूर कहीं से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती है । वह करवट बदलकर माँ के शरीर से सट जाता है ।

– तू सोया क्यों नहीं अभी ?

वह कुछ जवाब नहीं देता । माँ को धोखा देने के लिए लम्बी लम्बी साँसें लेने लगता है । माँ फिर धीरे धीरे परमात्मा को याद करने लगती है । वह फिर करवट बदल लेता है।

– क्या हो रहा है तुझे ? सो क्यों नहीं जाता ?

(…)

माँ उसका सिर खुजलाने लगती है । फिर अचानक उसका हाथ रुक जाता है ।

– यहाँ क्या हुआ तुझे ?

– कुछ नहीं ।

– बताता क्यों नहीं ? कुछ नहीं कहूँगी । बता दे, क्या हुआ था ? गिर पड़ा था ?

– हाँ।

– कैसे ? कहाँ से ? दिन को क्यों नहीं बताया ? इतना बड़ा रोड़ पड़ा हुआ है सिर में। बोल ना, कहाँ से गिरा था ? किसी ने धक्का तो नहीं दिया था ? बोल !

– यूँ ही खेलते खेलते गिर पड़ा था ।

– किसी ने मारा तो नहीं ? सच सच क्यों नहीं बताता ?

वह कैसे बताये कि मास्टरजी ने छड़ी मारी थी (…)।

– बता ना, किसी ने मारा तो नहीं ?

– नहीं माँ ! यूँही खेलते खेलते ठोकर लग गयी थी ।

– तुझे कितनी बार कहा है की ध्यान से खेला कर । अगर तुझे कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी ? तू अपना ख़याल क्यों नहीं रखता ? तेरे सहारे ही मैं जीती हूँ । अगर तुझे कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी ? बता ना, बोलता क्यों नहीं ? तुझे भी मेरा कोई ख़याल नहीं ? और सब तो मुझे दुख देते हैं…

माँ बोलती चली जाती है । वह कुछ समझता है, बहुत कुछ नहीं। फिर भी माँ की ये बातें उसे सुहाती हैं । उसका भला भर आता है । माँ हर समय ऐसी ही बातें करती रहे तो वह उससे इतना प्यार करे, इतना प्यार करे कि वह ख़ुश हो जाये !

– जब तक तू बड़ा नहीं होता, मेरी ज़िन्दगी नरक है, बेटा। भगवान तुझे जल्दी जल्दी बड़ा करे ! तेरा कभी बाल तक बाँका न हो ! तुझे कभी गर्म सर्द हवा न लगे ! तेरे सिवा मेरा है कौन, बेटा ? हे परमात्मा, इसे कभी कुछ न हो !

वह सटकर माँ के साथ लग जाता है । माँ के कपड़े भीगे भीगे से हैं, लेकिन उसे अब उनसे बू नहीं आती ।

माँ ने खुजलाना बन्द कर दिया है । हाथ जोड़कर, आँखें मूँदे, छत की ओर मुँह उठाये कह रही है – यही एक मेरी सारी उमर की कमाई है। इसे तो, हे भगवान, कभी कुछ न हो !

माँ किसी बात के पीछे न पड़ जाये ! अब शायद सारी रात यूँही ऊपर मुँह किये इसी तरह भगवान से बातें करती रहेगी ।

– माँ, मेरी सिर खुजलाओ, मुझे कुछ नहीं होगा । तुम मेरी चिन्ता न करो ।

– तुझे कुछ हो गया तो मैं तो जहर खाकर मर जाऊँगी । तेरी ही आसरे तो मैं ज़िंदा हूँ ।

माँ की आवाज़ काँप रही है । वह पल्लू से आँखें पोंछ पोंछ ठंडी साँसें ले रही है और बोल रही है । वह माँ की गोद में सिर रखकर लेट जाता है । वह कभी किसी के कहने से चुप नहीं करेगी। बोलती रहे ।

(…)

और माँ की आवाज़ डूब जाती है । कुछ देर तक ख़ामोशी रहती है । माँ का इस तरह धीरे धीरे रोना बीरू को बहुत अजीब लगता है । माँ तो जब कभी रोती है तो सारा क़स्बा सुनता है, गली के सब लोग उसके दरवाज़े के सामने इकट्ठे हो जाते हैं । और इस समय माँ इस तरह रो रही है कि उसकी आवाज़ उसके कानों तक भी नहीं पहुँच रही ।

– माँ, पानी ला दूँ ?

– बेटा, कभी बैठकर तू मेरा सारा हाल सुने तो तुझे पता चले कि मैंने क्या क्या जफ़र झेले हैं, कितना दुख भोगा है ।

अब माँ की यह रामकहानी न जाने कब ख़त्म होगी । इसी दम बाबा आ जायें तो शायद बात बदले । लेकिन फिर उन दोनों में जो लड़ाई होने का ख़तरा है उसे सोचकर उसका दिल बैठने लगता है । इससे तो यही अच्छा है कि माँ इसी तरह आराम से अपनी रामकहानी सुनाती रहे । इस तरह शायद उसे नींद भी आ जाये ।

(…)

माँ यह क्या क़िस्सा ले बैठी है । चुप करके सो जा ।

– माँ, तुम्हें नींद नहीं आ रही ?

– मुझे अब क्या नींद आयेगी, बेटा । मेरी नींद तो फ़िकरों में ही बरबाद हो गयी। मैं तो कभी कभी हैरान होती हूँ कि मैं यह सब कुछ सह कैसे गयी । मेरी जगह कोई और होता तो कब का प्राण छोड़ गया होता । मेरी हड्डी बहुत सख़्त है ।

इसमें तो कोई शक नहीं । कभी कभी माँ के मुँह से भी अपने बारे में सच्ची बात निकल ही जाती है । अगर माँ की हड्डी सख़्त न होती, तो जितनी मार उसे बाबा से पड़ती है, उसके टकड़े टकड़े हो गये होते ।

(…)

– माँ, कोई कहानी सुनाओ ऐसी कि नींद आ जाये, कोई अच्छी सी कहानी । किसी राजे की ।

वह माँ की गोद में सिमटता हुआ छोटा सा बन जाता है ।

– फिर तेरी बाबा की नौकरी लग गयी। मैंने लाख लाख शुक्र किया। सोचा, अब तेरी दादी से जान छूटेगी । लेकिन वह कहाँ पीछा छोड़ने वाली थी । वह भी हमारे साथ साथ ही रही । ये तनख्वाह लाते और सारी की सारी उसकी झोली में डाल देते । मैं एक एक पैसे को तरसती…

(…)

माँ हाथ लहरा-लहराकर बोलती जा रही है । बीरू हैरान है कि उसका यह क़िस्सा कब और कैसे ख़त्म हो । अब उसे हल्की सी नींद भी आने लगी है। अगर माँ कुछ धीमे बोलने लगी तो वह चुपचाप सो सकता है । लेकिन वह धीमे बोले कैसे ? उसे फिर उसके कपड़ों में से हल्दी, घी, तेल की बू आने लगती है । और माँ की गोद से खिसककर चारपाई पर लेट जाता है । चारपाई बहुत ढीली है । उसे लगता है, जैसे वह किसी टब में पड़ा हो । कभी कभी वह एक कहानी सुनाया करती है, जिसमें एक  राजा होता है। राजे को जब कभी कोई चिन्ता हो, तो वह टूटी हुई चारपाई लेकर उसमें पड़ा रहता है । उनके घर तो सारी चारपाइयाँ ऐसी हैं कि…

– मैं उन्हें शराब पीने से मना करती तो तेरी दादी मुझे डाँटने लगती । कहती, तू कौन होती है उसे मना करनेवाली ? नीच घराने की ! तेरी मजल जो तू मेरे बेटे को कुछ कहे ! तू अपने काम से काम रख ।…मैं सारी सारी रात रोती रहती । कोई मेरी ख़बर लेनेवाला नहीं था । हर रोज़ नशे में धुत ये घर लैटते, हर रोज़ मेरी पिटाई होती । कोई और मेरी जगह होता तो गले में रस्सी डालकर मर जाता ।

माँ कभी कोई ऐसी कहानी क्यों नहीं सुनाती जिसमें एक राजा हो, जिसकी सात रानियाँ हों…

– हर वक़्त मेरी अंग अंग दुखता रहता है । अपनी माँ की शह से वह और भी शेर हो जाते । मैंने मुँह खोला नहीं कि दोनों माँ बेटा मुझ पर पिल पड़ते ।

…राजा सबसे छोटी रानी को सबसे ज़्यादा प्यार करता हो । छोटी रानी का नाम फूलरानी हो…

– मैं कभी बीमार पड़ जाती तो तेरी दादी कहती, फ़रेब कर रही है । दवाई ता एक तरफ़, मेरा हाल पूछनेवाला कोई नहीं था ।

…एक दिन फूलरानी बीमार पड़ जाये, राजा रात भर करवटें बदलता रहे । उसे नींद न आये । दूसरे दिन राजा अपने वज़ीर को बुलाकर उससे कहे, देखो, इसी दम नगर मुनादी करवा दो, डम डम डम…

– कई कई दिन ये घर न लौटते । मेरी हरदम जान ख़ुश्क रहती । लेकिन तेरी दादी के डर के मारे किसी से बात करने की हिम्मत तक न होती । गली मुहल्ले की औरतें पूछतीं, कहाँ गये हैं, तो मुझे रोना आ जाता । हर वक़्त मेरा दिल यही चाहता कि गले में रस्सी डालकर अपनी जान ले लूँ । पता नहीं, वह कौनसी ऐसी शक्ति थी जिसने मुझे बचाये रखा । नहीं तो वे दुख…

– मुनादी करवा दी जाये, डम डम डम…फूलरानी बीमार है । जो कोई उसे अच्छा कर देगा, राजा अपना आधा राजपाट उसे दे देगा…

– बेटा, मेरी जवानी तो इन्हीं चीज़ों में घुल गयी । मैंने एक दिन भी तो सुख का मुँह नेहीं देखा । सच कहती हूँ बेटा ।

माँ के स्वरों में सहसा बीरू को किसी अपाहिज भिखारिन के स्वर सुनायी देने लगते हैं । उसकी अपनी कहानी का तन्तु कहीं गुम हो जाता है । फूलरानी ठीक होती है या नहीं होती, वह कुछ फ़ैसला नहीं कर पाता । माँ रो रही है । धीरे धीरे । उसे डर है अगर माँ ने रोना बन्द नहीं किया तो वह भी उसके साथ मिलकर रोने लगेगा ।

– माँ, रोओ नहीं ।

– मेरी क़िस्मत में सिवाय रोने के और कुछ लिखा ही नहीं । मेरी सारी उमर रोते रोते गुज़री है । मुझे कभी सुख नहीं मिला । मुझे कभी सुख नहीं मिलेगा ।

– रोओ मत, माँ ! मैं तुम्हें सुख दूँगा ।

माँ उसे चूम लेती है ।

वह कुछ झेंपकर अपना मुँह माँ की गोद में छुपा लेता है ।

दूसरे दिन भी वह माँ की आँखों से आँखें नहीं मिला पाता, मानो अपने उत्तरदायित्व से आँखें चुरा रहा हो ।

Notre traduction :

Maman, assise près de lui, commence à lui caresser la joue. Ses sentent les oignons et le kérosène. Il se met à respirer par la bouche plutôt que par le nez. Maman, pour lui fermer la bouche, lui remonte le menton. Puis, doucement, se met à parler – Ô mon Dieu ! Ô Seigneur ! Père de l’Univers !

Quelque part au loin, on entend les aboiements des chiens. Changeant de côté, il se blottit contre le corps de Maman.

– Tu ne dors toujours pas ?

Il ne répond pas. Pour donner le change, il se met à prendre des respirations profondes. Maman se remet doucement à invoquer le Tout-Puissant. Il change à nouveau de côté.

– Qu’est-ce que tu as ? Pourquoi tu ne dors pas ?

(…)

Maman se met à lui gratter la tête. Puis soudain, sa main s’arrête.

– Qu’est-ce qu’il t’est arrivé ici ?
– Rien.
– Pourquoi tu ne racontes pas ? Je ne dirai rien. Raconte, qu’est-ce qu’il t’est arrivé ? Tu es tombé ?
– Oui.
– Comment ? D’où ? Pourquoi tu n’as rien dit pendant la journée ? Avec une plaie comme ça sur la tête. Parle donc, d’où tu es tombé ? C’est pas quelqu’un qui t’aurait poussé ? Parle !
– Je suis tombé comme ça en jouant.
– C’est pas quelqu’un qui t’as frappé ? Pourquoi tu ne dis pas la vérité ?

Comment raconter qu’il s’est pris des coups de canne du maître (…).

– Allez, dis-moi, c’est pas quelqu’un qui t’a frappé ?
– Non, maman ! J’ai trébuché comme ça en jouant.
– Combien de fois je t’ai dit de faire attention quand tu joues. S’il t’arrive quelque chose, qu’est-ce que je ferai, moi ? Pourquoi tu ne fais pas attention à toi ? C’est toi ma seule raison de vivre. S’il t’arrive quelque chose, qu’est-ce que je ferai, moi ? Parle, pourquoi tu ne dis rien ? Toi aussi, tu n’en rien à faire de moi ? Tous autant qu’ils sont, ils ne me donnent que du chagrin…

Maman continue de parler. Il comprend certaines choses, beaucoup, non. Quoi qu’il en soit, ce que dit Maman lui plaît. Il se sent rempli d’aise. Si Maman parlait tout le temps ainsi, il l’en aimerait tellement, tellement, qu’elle en deviendrait heureuse !

– Tant que tu ne seras pas grand, ma vie est un enfer, mon fils. Dieu fasse que tu grandisses vite ! Qu’il ne t’arrive pas le moindre mal ! Que tu ne prennes jamais ni coup de chaud, ni coup de froid ! Qui d’autre ai-je que toi, mon fils ? Ô Tout-Puissant, faites que jamais rien ne lui arrive !

Il se blottit contre elle. Les habits de Maman sont tout humides, mais maintenant il ne sent plus leur odeur.

Maman a arrêté de lui gratter la tête. Les mains jointes, les yeux clos et le visage tourné vers le plafond, elle s’exclame – C’est lui, la récompense de toute une vie. Que jamais rien, ô Dieu, ne lui arrive !

Pourvu qu’elle ne s’y mette pas ! Si ça se trouve maintenant, elle va rester toute la nuit, comme ça, le visage tourné vers le haut, à parler à Dieu.

– Maman, gratte-moi la tête, il ne m’arrivera rien. Ne t’inquiète pas pour moi.
– S’il t’arrive quelque chose, je me tuerai en avalant du poison. C’est toi qui me garde en vie.

La voix de Maman tremble. Tout en parlant, elle s’essuie les yeux avec le pan de son vêtement et pousse de longs soupirs. Il s’allonge en posant la tête sur ses genoux. Elle ne se taira pas, même si on lui demande. Qu’elle continue donc.

(…)

Et la voix de Maman s’étouffe. Tout reste silencieux pendant un certain temps. Birou trouve très bizarre cette façon qu’a Maman de pleurer tout doucement. Quand Maman pleure, toute la ville peut l’entendre, tous les voisins s’attroupent devant la porte. Et là, Maman pleure d’une façon, que c’est à peine si le son de sa voix arrive jusqu’à ses oreilles.

– Maman, je t’apporte de l’eau ?
– Mon fils, qu’un jour tu prennes seulement le temps de m’écouter, et alors tu sauras combien de tempêtes j’ai essuyées, combien de malheurs j’ai soufferts.

Allez savoir maintenant quand est-ce qu’elle en aura fini avec son Odyssée. Si Papa arrivait là tout de suite, il pourrait en aller autrement. Mais, songeant ensuite au risque de dispute entre les deux, son cœur se serre. Mieux vaut que Maman continue ainsi à raconter son Odyssée. Ainsi peut-être, trouvera-t-il même le sommeil.

(…)

C’est quoi toute cette histoire. Tais-toi et dors.

– Maman, tu n’as pas sommeil ?

– Mon fils, comment pourrais-je trouver le sommeil ? Les soucis me l’ont complètement gâté, le sommeil. Des fois, je me demande comment j’ai pu supporter tout ça. Un autre à ma place aurait déjà rendu l’âme depuis longtemps. J’ai les os solides.

Ça, il n’y a pas de doute. Maman peut parfois aussi sortir sur elle-même de grandes vérités. Si Maman n’avait pas les os solides, après tous les coups qu’elle s’est pris de Papa, elle serait déjà en mille morceaux.

(…)

– Maman, raconte-moi une histoire pour que je m’endorme, une histoire bien, une histoire de roi.

Il se blottit contre elle en se faisant tout petit.

– Ensuite, ton Papa a décroché un travail. J’ai remercié mille fois. Je me suis dit, cette fois on va enfin être débarrassé de ta grand-mère. Mais, penses-tu, elle n’était pas prête à nous ficher la paix. Elle est restée avec nous. Il rapportait son salaire et lui remettait tout. Je convoitais douloureusement chaque petite pièce…

(…)

Maman parle et parle faisant des grands gestes de la main. Birou se demande quand et comment se finira cette mélopée. Il commence même à avoir légèrement sommeil. Si Maman se met à parler plus doucement il pourra s’endormir tranquillement. Mais comment pourrait-elle parler doucement ? Ses habits se remettent à sentir le curcuma, le beurre clarifié et l’huile. Il quitte ses genoux pour s’allonger sur le lit. Le lit est très mou. Il a l’impression d’être dans un espèce de bac. Maman raconte parfois une histoire où il y a un roi. Ce roi, quand quelque chose le tracasse, prend un lit défoncé et reste avachi dessus. Dans sa maison, tous les lits sont tels que…

– Quand je lui interdisais de boire, ta grand-mère se mettait à me rabrouer. Elle me disait, qui es-tu donc pour lui interdire ? Fille de rien ! De quel droit te permets-tu de dire quoi que ce soit à mon fils ! Mêle-toi de ce qui te regarde. …Je passais toute la nuit à pleurer. Il n’y avait personne pour s’enquérir de moi. Tous les jours, il rentrait à la maison ivre et tous les jours me battait. Quelqu’un d’autre à ma place se serait passé la corde au coup.

Maman, pourquoi tu ne racontes jamais d’histoire où il y aurait un roi, qui aurait sept reines…

– J’avais tout le temps mal partout. Les encouragements de sa mère le rendaient encore plus brute. J’avais à peine ouvert la bouche que mère et fils se jetaient sur moi.

…Le roi aimerait la plus jeune reine plus que toutes les autres. La jeune reine s’appellerait Reine des Fleurs…

– Si je tombais malade, ta grand-mère disait que je faisais semblant. Pas de médicaments et personne non plus pour s’inquiéter de mon sort.

…Un jour Reine des Fleurs tomberait malade, le roi passerait toute la nuit à se retourner sur sa couche. Il ne trouverait pas le sommeil. Le deuxième jour, le roi appellerait son premier ministre et lui dirait : « Écoute, fait immédiatement proclamer dans toute la ville… » Dam dam dam…

– Parfois il ne rentrait pas pendant des jours. J’en avais le sang glacé. Mais comme je craignais ta grand-mère, je n’osais parler à personne. Quand les femmes du quartier me demandaient où il était parti, j’avais envie de mettre à pleurer. À chaque instant, je n’avais qu’une chose en tête, me passer la corde au cou et en finir. Je ne sais pas qu’elle force m’a gardée en vie. Sans quoi, tous ces chagrins…
– Que l’on proclame, dam dam dam… Reine des Fleurs est malade. Le roi donnera la moitié de son royaume à celui qui pourra la soigner…
– Mon fils, ma jeunesse, c’est dans ces choses qu’elle s’est fanée. Pas un seul jour, je n’ai vu à quoi ressemblait le bonheur. Je t’assure, mon fils.

Soudain, Birou se met à entendre à travers la voix de Maman, celle d’une mendiante estropiée. Il perd le fil de son histoire. Reine des Fleurs se rétablit ou ne se rétablit pas, il n’arrive pas à décider. Maman pleure. Tout doucement. Il a peur que si Maman ne s’arrête pas de pleurer, alors se joignant à elle, il se mettra aussi à pleurer.

– Maman, pleure pas.
– À part pleurer, il n’y a rien d’autre d’écrit dans mon destin. J’ai passé ma vie à pleurer. Je n’ai jamais eu droit au bonheur. Je n’y aurait jamais droit.
– Ne pleure pas, Maman ! Moi, je t’en donnerai du bonheur.

Maman, l’embrasse.

Un peu embarrassé, il enfouit son visage dans ses genoux.

Même le lendemain, il n’arrive pas à la regarder dans les yeux, comme s’il essayait de se dérober à la vue de son devoir.

Le chapitre 6 illustre à merveille l’ambivalence de la relation entre Birou et sa mère, ce dernier oscillant entre amour inconditionnel et répulsion, comme le montre si bien la mise en scène de ce passage, où Birou tantôt se blottit dans les bras de sa mère et tantôt s’en écarte et lui tourne le dos. Pour ne pas faire trop long, j’ai coupé la plupart des passages correspondant à la « râmkahânî » de la mère, où celle-ci dépeint à son fils la vie affreuse que lui a fait sa belle-mère depuis le tout début, lorsque petite fille encore, elle a intégré son nouveau foyer. Vers la fin du chapitre, l’alternance en forme de parallélisme entre le récit plein de souffrance de la mère et le conte de rois et de princesses que se raconte Birou, se résout dans le dénouement final : le jeune Birou, qui aspire désespérément à la naïveté heureuse de l’enfance, prend sur lui de réaliser les espoirs bafoués de sa mère et, dans un élan d’amour filial et un sentiment de responsabilité peu puérile, fait une promesse qui pèse incroyablement sur ses jeunes épaules.

Références :

  • ‘उसका बचपन’ Uskā bacpan (« Son enfance »), New Delhi, Saraswati Press, 1957 ; New Delhi, Radhakrishnan Prakashan, 1981 ; Bikaner, Vagdevi Prakashan, 1997.

  Disponible en anglais : Steps in Darkness (traduit par l’auteur), New York, Orion Press, 1962 ; Delhi, Hind Pocket Books, 1970/1972 ; New Delhi/New York, Penguin Books, 1995.

  • Annie Montaut, « K. B. Vaid : Partition, exil, fragmentation », in Annie Montaut (ed.),  Littérature et poétiques pluriculturelles en Asie du Sud, collection Purusârtha, n° 24, Éditions de l’EHESS, 2004.
  • Annie Montaut, « Préface », in Krishna Baldev Vaid, Lila (traduit par Annie Montaut et Anne Castaing), Paris, Éditions Caractères, 2004.

Pour une bibliographie complète des œuvres de Vaid et des ouvrages critiques sur son œuvre, voir notre article : Krishna Baldev Vaid : biographie & bibliographie

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